काल भैरव की उत्पत्ति और काशी के कोतवाल बनने की अद्भुत कथा
“मो भूतनाथम्, नमो प्रेतनाथम्, नमः कालकालम्…”
इन मंत्रों में शिव के उस उग्र और दिव्य स्वरूप की झलक मिलती है जिन्हें संपूर्ण सृष्टि काल भैरव के नाम से जानती है।
देवताओं के बीच श्रेष्ठता को लेकर उत्पन्न विवाद

एक समय देवताओं के बीच यह प्रश्न उठा कि तीनों मुख्य देव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—में सर्वोच्च कौन है। विचार-विमर्श लंबा खिंचा और अंततः सभी ने वेदों से निर्णय करवाने का निश्चय किया।
वेदों ने स्पष्ट कहा—पूरे ब्रह्माण्ड का मूल और परम सत्य केवल भगवान शिव हैं, जिनमें यह चराचर जगत समाहित है।
विष्णु ने इस सत्य को स्वीकार कर लिया, परंतु ब्रह्मा जी को अपना श्रेष्ठत्व खोना स्वीकार नहीं हुआ।
ब्रह्मा जी का अहंकार और शिव का अपमान
अहंकार में डूबे ब्रह्मा जी ने अपने पाँचवें मुख से शिव और उनके गणों के रूप पर तंज कसते हुए अनादरपूर्ण वचन कहे।
इन अपमानजनक शब्दों को सुनकर भगवान शिव का क्रोध प्रचंड अग्नि की तरह फूट पड़ा।
उनके इस असीमित क्रोध को सृष्टि संभाल नहीं सकती थी, इसलिए शिव ने अपनी भ्रूमध्य से एक भयानक, तेजस्वी और उग्र रूप प्रकट किया। यह स्वरूप स्वयं महाकाल की शक्ति जैसा था।
इसी स्वरूप को उन्होंने नाम दिया—“काल”, जिसका अर्थ है समय और मृत्यु पर भी अधिकार रखने वाला।
यही आगे चलकर काल भैरव कहलाए।
काल भैरव द्वारा ब्रह्मा के पाँचवें मुख का दंड
भगवान शिव ने काल भैरव को आदेश दिया कि वे ब्रह्मा के उस मुख को दंड दें जिससे शिव का अपमान हुआ।
आदेश मिलते ही काल भैरव ने बिना किसी विलंब के ब्रह्मा जी के पाँचवें सिर को उनके शरीर से अलग कर दिया।
इसके साथ ही ब्रह्मा का अहंकार समाप्त हो गया।
लेकिन एक देवता का मुख काटने के कारण काल भैरव पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया।
कपाल का चिपक जाना और पाप का पीछा करना
ब्रह्मा का कटा हुआ सिर काल भैरव के हाथ से चिपक गया और ब्रह्महत्या का पाप एक भयंकर स्त्री रूप में उनके पीछे-पीछे चलने लगा।
इस कारण काल भैरव अत्यंत पीड़ित हो गए।
शिव ने उन्हें तीनों लोकों में घूमकर प्रायश्चित करने का निर्देश दिया।
वह “दंडपाणि” रूप में भ्रमण करते रहे, पर कहीं भी उन्हें शांति नहीं मिली क्योंकि कपाल हाथ से अलग नहीं हो रहा था और पाप लगातार पीछे लगा था।
काशी में प्रवेश करते ही मिला मुक्ति का वरदान
अंततः यात्राएँ करते-करते वे भगवान शिव की प्रिय नगरी—काशी पहुँचे।
जैसे ही उन्होंने नगर की सीमा पार की, चमत्कार हो गया—
ब्रह्मा का कटा हुआ कपाल उनके हाथ से स्वतः गिर गया और ब्रह्महत्या का पाप पाताल में लीन हो गया।
इस पवित्र स्थान को आज कपाल मोचन तीर्थ कहा जाता है।
यहीं काल भैरव ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए।
काशी के कोतवाल बने काल भैरव
मुक्ति के बाद भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने काल भैरव को यह दिव्य वरदान दिया कि—
✅ वे काशी के शाश्वत रक्षक और कोतवाल कहलाएँगे।
✅ जो भी भक्त काशी आएगा, उसे पहले काल भैरव की अनुमिति ग्रहण करनी होगी।
✅ काल भैरव हर उस व्यक्ति की रक्षा करेंगे जो धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलता है।
इसी कारण आज भी काल भैरव को काशी का कोतवाल, नगरपाल और भय दूर करने वाले देव के रूप में पूजा जाता है।
उनकी उपासना से व्यक्ति:
- समय के भय से मुक्त होता है
- पापों का नाश होता है
- संकट दूर होते हैं
- नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है