हनुमान भक्त और अभाव-मुक्त जीवन का रहस्य
जो भी व्यक्ति सच्चे मन से हनुमान जी की भक्ति करता है, उसके भीतर कभी अभाव की मानसिकता नहीं रहती। इसका कारण यह है कि भक्त जानते हैं कि हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता हैं।
सृष्टि में कुछ भी कमी नहीं—कमी केवल हमारे ग्रहण करने की क्षमता और विश्वास में होती है।
जो लोग इस आध्यात्मिक सत्य को समझ लेते हैं, वे कभी कंजूस, भयभीत या पाई-पाई जोड़ने वाले नहीं बनते।
इसी रहस्य को समझाने वाला एक अद्भुत प्रसंग बाबा नीब करौरी (नीम करौली) महाराज से जुड़ा हुआ है।
✅ लक्ष्मी दत्त त्रिपाठी और बाबा नीब करौरी जी का चमत्कारी प्रसंग
लखनऊ में रहने वाले बाबा जी के भक्त लक्ष्मी दत्त त्रिपाठी जी बेहद सरल स्वभाव के थे।
वे जब भी आश्रम जाते, देखते कि बाबा के दर्शन के लिए धनी लोग कारों में आते थे—जबकि उस समय (70 के दशक में) कार होना बहुत बड़ी बात थी।
इससे उनके मन में एक भ्रम बैठ गया कि शायद बाबा सिर्फ अमीरों के घर ही जाते हैं।
त्रिपाठी जी मन ही मन चाहते थे कि काश बाबा उनके घर भी भोजन प्रसाद ग्रहण करें।
इसके साथ ही उनकी एक आदत थी—
वे हर खर्च का हिसाब-किताब पाई-पाई तक लिखते थे।
फूल, प्रसाद, यात्रा, पूजा—हर बात का पूरा लेखा-जोखा उनके पास रहता था।
✅ बाबा ने मन की बात समझी
बाबा नीब करौरी जी तो सबके हृदय को जानने वाले थे।
उन्होंने स्वयं त्रिपाठी जी से कहा कि “हम तुम्हारे घर आएंगे” और तारीख भी बता दी।
निर्धारित दिन बाबा जी अपने 6–7 शिष्यों के साथ उनके द्वार पर पहुँचे।
त्रिपाठी जी अत्यंत प्रसन्न हुए।
उन्होंने पूरे प्रेम से भोजन प्रसाद की व्यवस्था की और सभी को आदरपूर्वक खिलाया।
✅ जब बाबा ने पूछा—“कितना खर्च हुआ?”
भोजन के बाद बाबा ने मुस्कुराते हुए पूछा—
“लक्ष्मी दत्त, इस भोजन में कितना खर्च हो गया?”
त्रिपाठी जी ने तुरंत बताया—
₹28.50
क्योंकि उन्हें सब कंठस्थ रहता था।
तब बाबा ने पूछा—
“महीने भर की चाय पर कितना खर्च करते हो?”
त्रिपाठी जी ने बताया—
₹8.50 प्रति माह।
बाबा मुस्कुराए और बोले:
“तो फिर हमने तो तुम्हारी एक महीने की चाय का खर्चा आज ही करवा दिया। अब तुम चाय नहीं पियोगे—क्योंकि तुम हिसाब बराबर करने में लग जाओगे। इसी कारण हम तुम्हारे घर नहीं आते थे। तुम पाई-पाई गिनते हो, और यह भक्ति में अविश्वास को दर्शाता है।”
✅ आध्यात्मिक संदेश: विश्वास दुनिया बदल देता है
बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखकर कहा:
**“अष्ट सिद्धि नवनिधि जिसके अधीन हैं, उस हनुमान जी की भक्ति करते हुए भी अगर तुम भविष्य को लेकर चिंतित हो, तो यह अविश्वास है।
ईश्वर के पास किसी चीज की कमी नहीं। वह हर क्षण तुम्हें चला रहे हैं। चिंता छोड़ो, भरोसा रखो।”**
इस प्रसंग के बाद कहा जाता है कि:
- त्रिपाठी जी ने पाई-पाई जोड़ने की आदत छोड़ दी
- निश्चिंत भाव में रहने लगे
- उनके घर महालक्ष्मी का आगमन हुआ
- परिवार समृद्ध होता गया
यह प्रसंग सिखाता है कि—
सृष्टि में किसी चीज की कमी नहीं।
कमी केवल हमारे भीतर के विश्वास की होती है।
जैसे ही निश्चिंतता आती है, समृद्धि अपने आप खिंची चली आती है।